मेह वो क्यों बहुत पीते बज़्म-ऐ-ग़ैर में या रब;
आज ही हुआ मंज़ूर उन को इम्तिहान अपना;
मँज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते `ग़ालिब`;
अर्श से इधर होता काश के माकन अपना!
~ Mir Taqi Mir
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ऐसी बेरुखी भी देखी है, हम ने आज कल के लोगों में;
आप से तुम तक, तुम से जान तक, जान से अनजान तक हो जाते हैं!
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अब ये हसरत है कि सीने से लगाकर तुझको;
इस क़दर रोऊँ की आंसू आ जाये!
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कैसे एक लफ्ज़ में बयां कर दूँ;
दिल को किस बात ने उदास किया!
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तुम चाहो तो ले लो मेरी रूह की तलाशी;
यकीन मानो, कुछ भी नहीं बचा मुझमे तुम्हारी मोहब्बत के सिवा!
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वो उम्र भर कहते रहे तुम्हारे "सीने में दिल" ही नहीं;
दिल का दौरा" क्या पड़ा, ये दाग भी धुल गया!
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बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए;
लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए!
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फिरते है मीर अब कहाँ ,कोई पूछता नहीं;
इस आशिक़ी में इज़्ज़त सादात भी गयी
~ Mir Taqi Mir
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अपनी सांसों में महकता पाया है तुझे, हर ख्वाब मे बुलाया है तुझे;
क्यू न करे याद तुझ को, जब खुदा ने हमारे लिए बनाया है तुझे!
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ये शायरीयाँ कुछ और नहीं बेइंतहा इश्क है;
तड़प उनकी उठती है और "दर्द" लफ्जों में उतर आता है!
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