तेरा मुस्कुराना नहीं:

तेरा मुस्कुराना नहीं भूलता है,
वो नज़रें झुकाना नहीं भूलता है;

मेरी ख़ाबगाह में मेरी जान का वो,
दबे पाँव आना नहीं भूलता है;

कि शर्मा के दांतों तले फिर तुम्हारा,
वो ऊँगली दबाना नहीं भूलता है;

वो गेसू सुखाना तेरा छत पे आ के,
क़यामत गिराना नहीं भूलता है;

लिपटना मेरे साथ आकर तुम्हारा,
वो मंज़र सुहाना नहीं भूलता है;

मुहब्बत निभाता दिलो-ओ-जाँ से 'सागर',
पुराना ज़माना नहीं भूलता है!
~ Sagar Sood
मुझको एक बार:

मुझको एक बार आजमाते तो सही,
वो मेरी बज़्म में आते तो सही;

मैंने रखा था सर-ए-शाम से घर को सजाकर,
तुम न रुकते एक पल को आते तो सही;

आपकी खातिर आपकी खुशियों की खातिर,
खुद भी हो जाता नीलाम, बताते तो सही;

यकीनन आपके हिस्से में रोशनी होती,
शम्म-ए-वफ़ा दिल में एक बार जलाते तो सही;

मैं भी इंसान हूँ पत्थर नहीं, क्यूँ ठुकराया,
खुद हो जाता टुकड़े-टुकड़े बताते तो सही!
गम-ए-जिंदगी को:
गम-ए-जिंदगी को इस कदर सँवार लेते हैं,
जाम होंठो से जिगर तक उतार लेते हैं;

तबाह होने की चाह में क्या-क्या करें हम,
एक रोग नया तेरे इश्क का आज़ार लेते हैं;

माना कि फांसलों से ही नजदीकीयाँ अपनी मगर,
दिल कहे, सुनेंगे कभी, एक दफा पुकार लेते है;

एक भी काम ना आया मशवरा तुझे भुलने का,
मगर, तेरी याद के लम्हें वक्त से बेशुमार लेते हैं;

ये मय ही तो हमदर्द , हमसफर मेरा अब साक़ी,
दर्द मिटाने को दवा कहा इश्क के बीमार लेते हैं!
तेरी किताब के हर्फ़े:

तेरी किताब के हर्फ़े समझ नहीं आते,
ऐ ज़िन्दगी तेरे फ़लसफ़े समझ नहीं आते;

कितने पन्नें हैं, किसको संभाल कर रखूँ,
और कौन से फाड़ दूँ सफे, समझ नहीं आते;

चौंकाया है ज़िन्दगी यूँ हर मोड़ पर तुमने,
बाक़ी कितने हैं शगूफे समझ नहीं आते;

हम तो ग़म में भी ठहाके लगाया करते थे;
अब आलम ये है कि लतीफे समझ नहीं आते;

तेरा शुकराना जो हर नेमत से नवाज़ा मुझको,
पर जाने क्यों अब तेरे तोहफ़े समझ नहीं आते!
राहत-ए-जाँ से तो:

राहत-ए-जाँ से तो ये दिल का बवाल अच्छा है,
उसने पूछा तो है इतना तेरा हाल अच्छा है;

माह अच्छा है बहुत ही न ये साल अच्छा है,
फिर भी हर एक से कहता हूँ कि हाल अच्छा है;

तेरे आने से कोई होश रहे या न रहे,
अब तलक तो तेरे बीमार का हाल अच्छा है;

आओ फिर दिल के समंदर की तरफ़ लौट चलें;
वही पानी, वही मछली, वही जाल अच्छा है;

कोई दीनार न दिरहम न रियाल अच्छा है,
जो ज़रूरत में हो मौजूद वो माल अच्छा है;

क्यों परखते हो सवालों से जवाबों को,
होंठ अच्छे हों तो समझो कि सवाल अच्छा है!
बदन पे जिस के शराफ़त:

बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा,
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा;

ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया,
किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा;

मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी,
कहीं जो तीर से घायल कोई हिरन देखा;

बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है,
सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा;

ज़ुबाँ है और बयाँ और उस का मतलब और,
अजीब आज की दुनिया का व्याकरन देखा;

लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे,
उन्होंने आज जो संतों का आचरन देखा;

जो सादगी है कुहन में हमारे में,
किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा!
रवा होते-होते एक दिन:

रवा होते-होते एक दिन रवा हो जायेगी,
यादें रह जायेंगीं, जिंदगी हवा हो जायेगी;

परवान तो चढने दो, गम को उरूज तक,
दर्द ही दर्द की, देखना, दवा हो जायेगी;

तुम हर रोज मिलना मुझे, घुंघट में से झांकते,
पुराने जमाने की, ये नयी अदा हो जायेगी;

जरूरी है फांसले मोहब्बत की रस्मों-रिवाज में वरना,
हमसे खता हो जायेगी या तुमसे खता हो जायेगी;

खूबाँ को देखकर, कहते हैं, बस में ठसे हुए मर्द,
दिल में जगाह चाहिए, बैठने को भी जगाह हो जायेगी।
आँखें शराब:

आँखें शराब खाना,
दिल हो गया दीवाना;

नजरों के तीर खा कर,
घायल हुआ जमाना;

भटकेंगी ये तो दर-दर,
नजरों का क्या ठिकाना;

नजरों की कदर करना,
नजरों से ना गिराना;

नज़रों की आब, इज्जत,
इस को सदा बढ़ाना;

शर्म-ओ-हया का जेवर,
नज़रों का है खज़ाना;

नज़रों के दायरे में,
गैरों को ना बसाना;

नज़रों में बंद रखना,
तुम राज-ए-दिल छुपाना!
ज़ख़्मी दिन और रात रहेंगे:

ज़ख़्मी दिन और रात रहेंगे कितने दिन,
दहशत में लम्हात रहेंगे कितने दिन;

हर पतझड़ के बाद है मौसम फूलों का,
ख़ाली अपने हाथ रहेंगे कितने दिन;

कितनी साँसे किस के पास हैं क्या मालूम,
हम तुम दोनों साथ रहेंगे कितने दिन;

पढ़ने वाले चेहरा भी पढ़ लेते हैं,
पोशीदा हालात रहेंगे कितने दिन;

कितने दिन तक वो दिन अपने साथ रहे,
ये दिन अपने साथ रहेंगे कितने-कितने दिन!
इक बेवफ़ा में रुह-ए-वफ़ा ढूंढ़ते रहे:

इक बेवफ़ा में रुह-ए-वफ़ा ढूंढ़ते रहे,
शोलों की बारिशों में सबा ढूंढ़ते रहे;

वो ढूंढ़ते हैं दिल को दुखाने का सिलसिला,
उनकी ख़ुशी में हम तो मज़ा ढूंढ़ते रहे;

वो हैं कि मुस्कुरा रहे हैं चीर के जिगर,
हम हैं कि यार खुद की ख़ता ढूंढ़ते रहे;

घबरा के देखते कभी आकाश की तरफ,
रुख़सत हुई ख़ुशी का पता ढूंढ़ते रहे;

ठहरी हुई नदी में भरे जो रवानगी,
शिद्दत से रात दिन वो अदा ढूंढ़ते रहे।
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