सरकता जाये है रुख से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता;
निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता-आहिस्ता!
~ Ameer Minai
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वो कभी मिल जाये मुझको अपनी साँसों के करीब;
होंठ को जुंबिश न दूँ और ग़ुफ्त-ग़ू सारी करूँ!
~ Zafar Gorakhpuri
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नहीं निग़ाह में मंज़िल तो जुस्त-जू ही सही;
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही!
~ Faiz Ahmad Faiz
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मेरे ग़ुज़रे हुये तेवर अभी भूली नहीं दुनिया;
अभी बिख़री हुयी हैं हर तरफ़ परछाइयाँ मेरी!
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वो बे-दर्दी से सर काटें और मैं कहूं उनसे;
हज़ूृर आहिस्ता-आहिस्ता, जनाब आहिस्ता-आहिस्ता!
~ Ameer Minai
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अब भी लोगों के दिल में ख़र की सूरत खटकता हूँ;
अभी तक याद है अहल-ए-चमन को दास्तां मेरी!
~ Shamsi Meenai
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है आशिक़ी में रस्म, अलग सब से बैठना;
बुत ख़ाना भी, हरम भी, कलीसा भी छोड़ दे!
~ Allama Iqbal
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ग़ुज़री तमाम उम्र उसी शहर में जहाँ;
वाक़िफ़ सभी थे पहचानता कोई न था!
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गुनाहगार के दिल से न बच के चल ज़ाहिद;
यहीं कहीं तिरी जन्नत भी पाई जाती है!

ज़ाहिद = धार्मिक व्यक्ति
~ Jigar Moradabadi
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तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है, समझता हूँ,
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है, समझता हूँ,
तुम्हें मैं भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन,
तुम्हीं को भूलना सबसे जरूरी है, समझता हूँ!
~ Dr. Kumar Vishwas
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