पीने से कर चुका था मैं तौबा दोस्तों;
बादलो का रंग देख नीयत बदल गई!
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यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं;
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे!
~ Bashir Badr
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पीते थे शराब हम उसने छुड़ाई अपनी कसम देकर;
महफ़िल में यारों ने पिलाई उसी की कसम देकर।x
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रात को पी, सुबह को तौबा की;
रिन्ध के रिन्ध रहे, हाथ से जन्नत ना गयी!
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आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़';
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए!
~ Firaq Gorakhpuri
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ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ;
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया!
~ Sheikh Ibrahim Zauq
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कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गयी;
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गयी।
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ये ना पूछ मैं शराबी क्यों हुआ, बस यूँ समझ ले;< br/> गमों के बोझ से, नशे की बोतल सस्ती लगी।
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कभी उलझ पड़े खुदा से कभी साक़ी से हंगामा;
ना नमाज अदा हो सकी ना शराब पी सके।
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न जख्म भरे, न शराब सहारा हुई;
न वो वापस लौटी न मोहब्बत दोबारा हुई!
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