दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ;
बाज़ार से ग़ुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ!
~ Akbar Allahabadi
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तुझ पे उठ्ठी हैं वो खोई हुयी साहिर आँखें;
तुझ को मालूम है क्यों उम्र गवाँ दी हमने!
~ Faiz Ahmad Faiz
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जिस दिल को सौंपा था मोड़ भी आया उसे;
वो चाहता था छोड़ना मैं छोड़ भी आया उसे;
अब के ताल्लुक ना रखेगा वो कोई मुझसे;
मैं दोनों हाथों को अब जोड़ भी आया उसे!
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हिज्र के साहिल पे था जो इश्क का आशियाना;
ग़म की बरसात में नदीम इक रोज़ ढह गया!
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थक गया मेरा पुर्जा-पुर्जा तकलीफों से निकलने में;
हार मानने का दिल नहीं करता और जीत नजर नहीं आती!
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माना की मरने वालों को भुला देतें है सभी;
मुझे जिंदा भूलकर तुमने तो कहावत ही बदल दी!
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तेरी बाँहों में हमें उम्र कैद की सज़ा चाहिए;
और ये सज़ा हमें बेवजह चाहिए!
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साँसों की माला में पिरो कर रखे हैं तेरी चाहतो के मोती,
अब तो तमन्ना यही है कि बिखरूं तो सिर्फ तेरे आगोश में!
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महफ़िल में गले मिल के, वो धीरे से कह गए;
ये दुनिया की रस्म है, इसे मोहब्बत न समझ लेना!
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गुमान था कि कोई दुश्मन जान नही ले सकता;
अपनों के वार का तो ख़याल तक ना था!
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