इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन;
देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के!
~ Faiz Ahmad Faiz
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जो लम्हा साथ हैं, उसे जी भर के जी लेना;
कम्बख्त ये जिंदगी भरोसे के काबिल नहीं है!
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महफ़िल में हँसना तो हमारा मिज़ाज़ बन गया,
तन्हाई में रोना एक राज़ बन गया;
दिल के दर्द को चेहरे से ज़ाहिर ना होने दिया,
यही ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ बन गया!
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गर मर जाए एहसास किसी की रूह से बेवक्त,
ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त से आदमी रू-ब-रू होता है!
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ज़िन्दगी तो अपने क़दमों पे चलती है 'फ़राज़';
औरों के सहारे तो जनाज़े उठा करते हैं।
~ Ahmad Faraz
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इतना क्यों सिखाए जा रही हो ज़िन्दगी;
हमें कौन सी यहाँ सदियाँ गुज़ारनी हैं!
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झट से बदल दूं, इतनी न हैसियत न आदत है मेरी;
रिश्ते हों या लिबास, मैं बरसों चलाता हूँ!
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ज़िंदगी निकली मुसलसल इम्तिहाँ-दर-इम्तिहाँ;
ज़िंदगी को दास्ताँ ही दास्ताँ समझा था मैं!

Meaning:

मुसलसल - लगातार, निरंतर
~ Jigar Moradabadi
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यूँ चेहरे पर उदासी ना ओढिये साहब;
वक़्त ज़रूर तकलीफ का है लेकिन कटेगा मुस्कुराने से ही।
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ना पाने की खुशी है कुछ, ना खोने का ही कुछ गम है;
ये दौलत और शोहरत सिर्फ, कुछ ज़ख्मों का मरहम है;
अजब सी कशमकश है, रोज़ जीने, रोज़ मरने में;
मुक्कमल ज़िन्दगी तो है, मगर पूरी से कुछ कम है।
~ Dr. Kumar Vishwas
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