एक बार एक बूढी महिला अपने घर के आँगन मैं बैठी स्वेटर बुन रही थी कि तभी अचानक एक आदमी उसकी आँख बचाते हुए उसकी कुर्सी के नीचे बम रख कर भाग गया।

आदमी को इतनी जल्दी में भागते हुए देख, कुछ लोगों को शक हुआ तो उन्होंने आँगन में झाँक कर देखा तो उनकी नज़र बुढिया की कुर्सी के नीचे रखे बम पर पड़ी।

यह देख कर उन लोगों ने बुढिया को आगाह करने के लिए घर के बाहर से ही चिल्लाना शुरू कर दिया "बुढिया बम है, बुढिया बम है।"

यह शोर-गुल सुन कर बुढिया एक पल के लिए चौंकी और फिर शर्माते हुए बोली, " अरे अब वो बात कहाँ, बम तो मैं जवानी में होती थी।"
लोगों के बहकावे में आकर कछुए और खरगोश में फिर से पाँच मील की दौड़ लग गई!

तीन मील की दूरी पर जा कर खरगोश ने देखा कि कछुआ बहुत दूर है और उसने सामने के ठेके से एक बोतल ली और पीना शुरू कर दिया!

दो या तीन पैग पीने के बाद... उसने सामने से कछुए को आता हुआ देखा और बोला, "ले भाई, आज तू भी ले!"

कछुआ भी बैठ गया और पीते-पीते बोतल खत्म हो गई!

कछुए ने कहा: तुम मेरे इतने अच्छे दोस्त हो, और मैं तुम्हारे साथ दौड़ने की होड़ के लिए लोगों की बातों में आ गया, तुम्हारे साथ क्या हार क्या जीत? चल भाई एक हॉफ और मँगा ले!"

फिर दोनों खुशी-खुशी घर चले गए!

कथासार:अपने दोस्तों के साथ आख़िर किस बात की रेस! हर समय हार-जीत के पीछे ही भागते न रहें, साथ बैठिये, दो पेग लीजिए और देखिए कि ये ज़िन्दगी सच में कितनी ज़्यादा खूबसूरत है!
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